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(शोध एवं प्रकाशन)
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==शोध एवं प्रकाशन==
 
==शोध एवं प्रकाशन==
:इस विभाग के अन्तर्गत संस्थान में आने वाले शोध अध्येताओं को शोध सामग्री उपलब्ध कराने के साथ ही यहाँ संरक्षित पाण्डुलिपियों/दस्तावेजों पर केन्द्रित शोध एवं प्रकाशन कार्य किये जाते हैं। विभाग द्वारा अब तक ब्रज संस्कृति से जुड़े विभिन्न विषयों पर 29 शोधपरक विषयों पर पुस्तकों का प्रकाशन कराया जा चुका हैं। जिनमें कई दुर्लभ पाण्डुलिपियों का संपादन भी सम्मिलित हैं। शोध अध्येताओं की संस्थान के हस्तलिखित ग्रन्थागार तक सहजतापूर्वक पहुँच बनाने के लिए विभाग द्वारा संस्कृत, हिन्दी, बंगला और पंजाबी पाण्डुलिपियों के कैटलाॅग भी कई खण्डों में प्रकाशित कराये गये हैं। शोधार्थियों की सुविधार्थ, अधिकाधिक पाण्डुलिपियों तक उनकी पहुँच बनाने के निमित्त संस्थान के द्वारा विभिन्न निजी संग्रहों में रखी पाण्डुलिपियों की डिजिटाइजेशन कराने के साथ ही इनका कैटलाॅग भी प्रकाशित किया गया हैं ताकि अध्येता को संस्थान में एक ही जगह अधिक से अधिक शोध सन्दर्भ प्राप्त हो सकें।  
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:इस विभाग के अन्तर्गत संस्थान में आने वाले शोध अध्येताओं को शोध सामग्री उपलब्ध कराने के साथ ही यहाँ संरक्षित पाण्डुलिपियों/दस्तावेजों पर केन्द्रित शोध एवं प्रकाशन कार्य किये जाते हैं। विभाग द्वारा अब तक ब्रज संस्कृति से जुड़े विभिन्न विषयों पर 29 शोधपरक विषयों पर पुस्तकों का प्रकाशन कराया जा चुका हैं। जिनमें कई दुर्लभ पाण्डुलिपियों का संपादन भी सम्मिलित हैं। शोध अध्येताओं की संस्थान के हस्तलिखित ग्रन्थागार तक सहजतापूर्वक पहुँच बनाने के लिए विभाग द्वारा संस्कृत, हिन्दी, बंगला और पंजाबी पाण्डुलिपियों के कैटलाॅग भी कई खण्डों में प्रकाशित कराये गये हैं। शोधार्थियों की सुविधार्थ, अधिकाधिक पाण्डुलिपियों तक उनकी पहुँच बनाने के निमित्त संस्थान के द्वारा विभिन्न निजी संग्रहों में रखी पाण्डुलिपियों की डिजिटाइजेशन कराने के साथ ही इनका कैटलाॅग भी प्रकाशित किया गया हैं ताकि अध्येता को संस्थान में एक ही जगह अधिक से अधिक शोध सन्दर्भ प्राप्त हो सकें। ब्रज संस्कृति पर केन्द्रित त्रैमासिक शोध पत्रिका ‘ब्रज सलिला’ का प्रकाशन भी विभाग द्वारा निरंतर किया जाता है।  
:विभाग द्वारा वर्तमान में ब्रज संस्कृति के वैविध्यपूर्ण विषयों पर सर्वेक्षण एवं दस्तावेजीकरण की परियोजना भी संचालित हैं। जिसमें ब्रज संस्कृति से जुड़े अलग-अलग पक्षों पर शोध परियोजना तैयार करने के उपरान्त ब्रज के विभिन्न स्थलों पर जाकर सर्वेक्षण करते हुए विभिन्न परंपराओं का दस्तावेजीकरण किया जाता हैं। इसी योजना के अंतर्गत ‘वृन्दावन के रंग मंदिर का श्रीब्रह्मोत्सव’, ‘वृन्दावन की फूल-बंगला कला’, ‘वृन्दावन की मल्लविद्या परम्परा’, ‘ब्रज की तुलसीकंठीमाला’ एवं ‘ब्रज की साँझी’ आदि विषयों पर भी शोधपरक प्रकाशन किये जा चुके हैं। योजनान्तर्गत वर्तमान में ‘ब्रज के पर्वांत्सवों’ पर सर्वेक्षण कार्य जारी है। ब्रज संस्कृति पर केन्द्रित त्रैमासिक शोध पत्रिका ‘ब्रज सलिला’ का प्रकाशन भी विभाग द्वारा निरंतर किया जाता है।  
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:गौड़ीय वैष्णव संस्कृति से अभिप्रेत दुर्लभ ग्रंथ रत्नों की विद्यमानता के चलते संस्थान के हस्तलिखित ग्रंथागार का अपना महत्व है। चैतन्य परंपरा के प्रमुख साधक रूप, सनातन एवं जीव गोस्वामी के हस्तलेख हों या बादशाह अकबर का इनके नाम फरमान और इसी के साथ अनेक गौड़ीय साधकों की दुर्लभ पांडुलिपियांऋ सभी कुछ चैतन्य संस्कृति से जुड़े दुर्लभ पक्षों का महत्व दर्शाने वाले हैं। इसी दृष्टिगत वर्तमान में संस्थान चैतन्य महाप्रभु पर एकाग्र वृहद परियोजना तैयार करने में संलग्न है। जिससे संस्थान के हस्तलिखित ग्रंथागार का महत्व अध्येताओं के साथ आमजन के समक्ष उपस्थित तो हो ही, साथ ही चैतन्य संस्कृति से जुड़े नये शोध सन्दर्भ भी अध्येताओं के साथ साझा हो सकें।
 
:गौड़ीय वैष्णव संस्कृति से अभिप्रेत दुर्लभ ग्रंथ रत्नों की विद्यमानता के चलते संस्थान के हस्तलिखित ग्रंथागार का अपना महत्व है। चैतन्य परंपरा के प्रमुख साधक रूप, सनातन एवं जीव गोस्वामी के हस्तलेख हों या बादशाह अकबर का इनके नाम फरमान और इसी के साथ अनेक गौड़ीय साधकों की दुर्लभ पांडुलिपियांऋ सभी कुछ चैतन्य संस्कृति से जुड़े दुर्लभ पक्षों का महत्व दर्शाने वाले हैं। इसी दृष्टिगत वर्तमान में संस्थान चैतन्य महाप्रभु पर एकाग्र वृहद परियोजना तैयार करने में संलग्न है। जिससे संस्थान के हस्तलिखित ग्रंथागार का महत्व अध्येताओं के साथ आमजन के समक्ष उपस्थित तो हो ही, साथ ही चैतन्य संस्कृति से जुड़े नये शोध सन्दर्भ भी अध्येताओं के साथ साझा हो सकें।
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==पाण्डुलिपि पुस्तकालय (हस्तलिखित ग्रंथागार)==
 
==पाण्डुलिपि पुस्तकालय (हस्तलिखित ग्रंथागार)==
 
:संस्थान का समृद्ध हस्तलिखित ग्रंथागार इसकी अपनी विशिष्ट पहिचान है। हिन्दी, बंगला, संस्कृत, गुरुमुखी एवं उड़िया साहित्य की लगभग 35,000 पाण्डुलिपियों की विद्यमानता के चलते यह संस्थान शुरू से ही देशी-विदेशी शोध अध्येताओं के आकर्षण का केन्द्र रहा है। शोध के लिये प्राथमिक सन्दर्भ सामग्री के रूप में यहाँ विद्यमान बादशाह अकबर के फरमान सहित मध्यकालीन विभिन्न रियासतों के द्वारा ब्रज के मन्दिरों को दिये गये विभिन्न दान-पत्र, संकल्प-पत्र, उत्तराधिकार-पत्र एवं प्राचीन याद्दाश्ती अभिलेख इस ग्रंथागार के महत्व का प्रतिपादन करने वाले ह®। यहाँ संरक्षित सूक्ष्माक्षरी एवं दीर्घाक्षरी पाण्डुलिपियों के आकार-प्रकार तथा आयुर्वेद, ज्योतिष, पद-संग्र्रह, उर्दू एवं फारसी आदि विषयवस्तु की विविधताओं के चलते यह ग्रंथागार न केवल शोधार्थियों बल्कि आम पर्यटकों को भी सहज ही अपनी ओर आकर्षित करता है। वैष्णव सम्प्रदायों का हस्तलिखित साहित्य ब्रज संस्कृति की महत्त्वपूर्ण निधि है। ब्रज के विभिन्न मन्दिरों से संस्थान को दानस्वरूप प्राप्त यह ग्रन्थ राशि ब्रज संस्कृति के देवालयी परिवेश से जुड़े साहित्यिक एवं सांस्कृतिक उत्स का भान कराने वाली हैं। संस्थान में विभिन्न भारतीय विश्वविद्यालयों से आने वाले शोध अध्येताओं के साथ ही विदेशी शोध छात्रों द्वारा भी इस साहित्यिक संपदा का उपयोग अपने शोधकार्यों हेतु किया जाता हंै। शोध प्रक्रिया को सहज बनाने के उद्देश्य से संस्थान द्वारा राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन, भारत सरकार के सहयोग से ग्रन्थागार की सभी पाण्डुलिपियों का डिजिटाइजेशन भी कराया गया हैं जिससे शोधार्थियों को तत्काल शोध सहायता मुहैया करायी जा सके। (विस्तृत विवरण हेतु क्लिक करें।)
 
:संस्थान का समृद्ध हस्तलिखित ग्रंथागार इसकी अपनी विशिष्ट पहिचान है। हिन्दी, बंगला, संस्कृत, गुरुमुखी एवं उड़िया साहित्य की लगभग 35,000 पाण्डुलिपियों की विद्यमानता के चलते यह संस्थान शुरू से ही देशी-विदेशी शोध अध्येताओं के आकर्षण का केन्द्र रहा है। शोध के लिये प्राथमिक सन्दर्भ सामग्री के रूप में यहाँ विद्यमान बादशाह अकबर के फरमान सहित मध्यकालीन विभिन्न रियासतों के द्वारा ब्रज के मन्दिरों को दिये गये विभिन्न दान-पत्र, संकल्प-पत्र, उत्तराधिकार-पत्र एवं प्राचीन याद्दाश्ती अभिलेख इस ग्रंथागार के महत्व का प्रतिपादन करने वाले ह®। यहाँ संरक्षित सूक्ष्माक्षरी एवं दीर्घाक्षरी पाण्डुलिपियों के आकार-प्रकार तथा आयुर्वेद, ज्योतिष, पद-संग्र्रह, उर्दू एवं फारसी आदि विषयवस्तु की विविधताओं के चलते यह ग्रंथागार न केवल शोधार्थियों बल्कि आम पर्यटकों को भी सहज ही अपनी ओर आकर्षित करता है। वैष्णव सम्प्रदायों का हस्तलिखित साहित्य ब्रज संस्कृति की महत्त्वपूर्ण निधि है। ब्रज के विभिन्न मन्दिरों से संस्थान को दानस्वरूप प्राप्त यह ग्रन्थ राशि ब्रज संस्कृति के देवालयी परिवेश से जुड़े साहित्यिक एवं सांस्कृतिक उत्स का भान कराने वाली हैं। संस्थान में विभिन्न भारतीय विश्वविद्यालयों से आने वाले शोध अध्येताओं के साथ ही विदेशी शोध छात्रों द्वारा भी इस साहित्यिक संपदा का उपयोग अपने शोधकार्यों हेतु किया जाता हंै। शोध प्रक्रिया को सहज बनाने के उद्देश्य से संस्थान द्वारा राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन, भारत सरकार के सहयोग से ग्रन्थागार की सभी पाण्डुलिपियों का डिजिटाइजेशन भी कराया गया हैं जिससे शोधार्थियों को तत्काल शोध सहायता मुहैया करायी जा सके। (विस्तृत विवरण हेतु क्लिक करें।)

17:23, 5 जनवरी 2020 का अवतरण

शोध एवं प्रकाशन

इस विभाग के अन्तर्गत संस्थान में आने वाले शोध अध्येताओं को शोध सामग्री उपलब्ध कराने के साथ ही यहाँ संरक्षित पाण्डुलिपियों/दस्तावेजों पर केन्द्रित शोध एवं प्रकाशन कार्य किये जाते हैं। विभाग द्वारा अब तक ब्रज संस्कृति से जुड़े विभिन्न विषयों पर 29 शोधपरक विषयों पर पुस्तकों का प्रकाशन कराया जा चुका हैं। जिनमें कई दुर्लभ पाण्डुलिपियों का संपादन भी सम्मिलित हैं। शोध अध्येताओं की संस्थान के हस्तलिखित ग्रन्थागार तक सहजतापूर्वक पहुँच बनाने के लिए विभाग द्वारा संस्कृत, हिन्दी, बंगला और पंजाबी पाण्डुलिपियों के कैटलाॅग भी कई खण्डों में प्रकाशित कराये गये हैं। शोधार्थियों की सुविधार्थ, अधिकाधिक पाण्डुलिपियों तक उनकी पहुँच बनाने के निमित्त संस्थान के द्वारा विभिन्न निजी संग्रहों में रखी पाण्डुलिपियों की डिजिटाइजेशन कराने के साथ ही इनका कैटलाॅग भी प्रकाशित किया गया हैं ताकि अध्येता को संस्थान में एक ही जगह अधिक से अधिक शोध सन्दर्भ प्राप्त हो सकें। ब्रज संस्कृति पर केन्द्रित त्रैमासिक शोध पत्रिका ‘ब्रज सलिला’ का प्रकाशन भी विभाग द्वारा निरंतर किया जाता है।
गौड़ीय वैष्णव संस्कृति से अभिप्रेत दुर्लभ ग्रंथ रत्नों की विद्यमानता के चलते संस्थान के हस्तलिखित ग्रंथागार का अपना महत्व है। चैतन्य परंपरा के प्रमुख साधक रूप, सनातन एवं जीव गोस्वामी के हस्तलेख हों या बादशाह अकबर का इनके नाम फरमान और इसी के साथ अनेक गौड़ीय साधकों की दुर्लभ पांडुलिपियांऋ सभी कुछ चैतन्य संस्कृति से जुड़े दुर्लभ पक्षों का महत्व दर्शाने वाले हैं। इसी दृष्टिगत वर्तमान में संस्थान चैतन्य महाप्रभु पर एकाग्र वृहद परियोजना तैयार करने में संलग्न है। जिससे संस्थान के हस्तलिखित ग्रंथागार का महत्व अध्येताओं के साथ आमजन के समक्ष उपस्थित तो हो ही, साथ ही चैतन्य संस्कृति से जुड़े नये शोध सन्दर्भ भी अध्येताओं के साथ साझा हो सकें।

पाण्डुलिपि पुस्तकालय (हस्तलिखित ग्रंथागार)

संस्थान का समृद्ध हस्तलिखित ग्रंथागार इसकी अपनी विशिष्ट पहिचान है। हिन्दी, बंगला, संस्कृत, गुरुमुखी एवं उड़िया साहित्य की लगभग 35,000 पाण्डुलिपियों की विद्यमानता के चलते यह संस्थान शुरू से ही देशी-विदेशी शोध अध्येताओं के आकर्षण का केन्द्र रहा है। शोध के लिये प्राथमिक सन्दर्भ सामग्री के रूप में यहाँ विद्यमान बादशाह अकबर के फरमान सहित मध्यकालीन विभिन्न रियासतों के द्वारा ब्रज के मन्दिरों को दिये गये विभिन्न दान-पत्र, संकल्प-पत्र, उत्तराधिकार-पत्र एवं प्राचीन याद्दाश्ती अभिलेख इस ग्रंथागार के महत्व का प्रतिपादन करने वाले ह®। यहाँ संरक्षित सूक्ष्माक्षरी एवं दीर्घाक्षरी पाण्डुलिपियों के आकार-प्रकार तथा आयुर्वेद, ज्योतिष, पद-संग्र्रह, उर्दू एवं फारसी आदि विषयवस्तु की विविधताओं के चलते यह ग्रंथागार न केवल शोधार्थियों बल्कि आम पर्यटकों को भी सहज ही अपनी ओर आकर्षित करता है। वैष्णव सम्प्रदायों का हस्तलिखित साहित्य ब्रज संस्कृति की महत्त्वपूर्ण निधि है। ब्रज के विभिन्न मन्दिरों से संस्थान को दानस्वरूप प्राप्त यह ग्रन्थ राशि ब्रज संस्कृति के देवालयी परिवेश से जुड़े साहित्यिक एवं सांस्कृतिक उत्स का भान कराने वाली हैं। संस्थान में विभिन्न भारतीय विश्वविद्यालयों से आने वाले शोध अध्येताओं के साथ ही विदेशी शोध छात्रों द्वारा भी इस साहित्यिक संपदा का उपयोग अपने शोधकार्यों हेतु किया जाता हंै। शोध प्रक्रिया को सहज बनाने के उद्देश्य से संस्थान द्वारा राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन, भारत सरकार के सहयोग से ग्रन्थागार की सभी पाण्डुलिपियों का डिजिटाइजेशन भी कराया गया हैं जिससे शोधार्थियों को तत्काल शोध सहायता मुहैया करायी जा सके। (विस्तृत विवरण हेतु क्लिक करें।)

संदर्भ पुस्तकालय

शोधकर्ताओं एवं छात्रों के लिये शोध संस्थान में संदर्भ पुस्तकालय भी है। जहाँ हिन्दी, बंगला, उड़िया, गुजराती, गुरुमुखी, अंग्रेजी, उर्दू एवं फारसी आदि भाषाओं की 15,000 पुस्तकों के साथ ही विभिन्न शब्दकोश पत्रिकायें एवं शोध ग्रन्थ संगृहीत हैं। जिनसे देश-विदेश के अनेक शोधार्थी वर्ष पर्यन्त लाभान्वित होते हैं। (विस्तृत विवरण हेतु क्लिक करें।)

संरक्षण

वृन्दावन शोध संस्थान के पाण्डुलिपि ग्रन्थालय में संग्रहीत अधिकांश पाण्डुलिपियाँ प्राचीन होने के कारण जीर्ण-शीर्ण एवं कीड़ों व दीमकों आदि के द्वारा खायी हुई अवस्था में प्राप्त होती हैं। इन्हें दीर्घजीवी बनाने व इनके स्वरूप को निखारने हेतु संस्थान में आधुनिक तकनीकी युक्त वैज्ञानिक प्रयोगशाला अवस्थित है, जिसमें धूमिकरण, स्याही का स्थायीकरण, अम्लीयकरण, लेमिनेशन और बाइडिंग आदि के द्वारा उन्हें समुचित चिकित्सा करके उन्हें दीर्घजीवी बनाया जाता हंै। पाण्डुलिपि संरक्षण विभाग के द्वारा जन जागृति लाने हेतु यहाँ यथासमय ग्रन्थ संरक्षण के सम्बन्ध में राष्ट्रिय व अन्तर्राट्रीय संगोष्ठी, पाठ्यक्रम व कार्यशालायें आदि संचालित की जाती है।

माइक्रोफिल्मिंग/डिजिटाइजेशन

माइक्रोफिल्मिंग/डिजिटाइजेशन के क्षेत्र में वृन्दावन शोध संस्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। कतिपय अमूल्य ग्रन्थ व पाण्डुलिपि धारक विभिन्न कारणों से अपनी पाण्डुलिपि अथवा ग्रन्थ संस्थान को दान से कतराते हैं। ऐसी स्थिति में संस्थान के द्वारा पाण्डुलिपि व ग्रन्थों की माइक्रोफिल्मिंग कर उन्हें अपने यहाँ सुरक्षित कर लिया जाता है, साथ ही उनको माइक्रो प्रिन्ट्स तत्सम्बन्धित शोधार्थियों को उपलब्ध करा दिये जाते हैं। वर्तमान में संस्थान द्वारा विभिन्न स्थलों पर जाकर डिजिटाइजेशन कार्य पूर्ण किया जा रहा है। विभाग द्वारा निर्दिष्ट स्थलों पर किये गये कार्य के उपरान्त वहाँ विद्यमान पाण्डुलिपियों का कैटलाॅग भी तैयार कर दिया जाता हैं। जिससे शोधार्थियों को अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े।

फोटोग्राफी

वृन्दावन शोध संस्थान ब्रज के ऐतिहासिक, धार्मिक, पुरातात्विक स्थलों का चित्रांकन करके भी उनका संरक्षण भी कर रहा है। फोटोग्राफी विभाग द्वारा ब्रज की सांस्कृतिक गतिविधियों, आयोजनों रीति-रिवाजों, परम्पराओं आदि की फोटोग्राफी कर उन्हें चित्रांकन रूप में संरक्षित रखा जाता है। इस विभाग के द्वारा दुर्लभ एवं चित्रित पाण्डुलिपियों के डिजिटलाइजेशन का कार्य भी किया जाता है। समय-समय पर विषय केन्द्रित प्रदर्शनियों का आयोजन भी इस विभाग द्वारा किया जाता हंै जिससे ब्रज में आने वाले पर्यटकों के साथ ही युवा पीढ़ी भी ब्रज के सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं ऐतिहासिक पक्षों से साक्षात्कार कर सकें।

ब्रज संस्कृति संग्रहालय

ब्रज संस्कृति के साहित्यिक, सांस्कृतिक, सांगीतिक एवं कला-परम्पराओं का परिदर्शन कराता संस्थान का यह अनुभाग अत्यन्त महत्वपूर्ण व ज्ञानवर्धक है। यहाँ पुरातात्विक महत्व की पाण्डुलिपियों के नमूने, पेंटिंग्स, सिक्के, शासकीय फरमान, पट्टे, ब्रज की पारम्परिक पोशाकें, प्राचीन वाद्य यन्त्र व अन्य कलात्मक वस्तुयें प्रदर्शित हैं। इस संग्रहालय में ताड़-पत्र, बाँस-पत्र आदि पर लिखी हुई पाण्डुलिपियाँ एवं विभिन्न शैलियों में बने तैल चित्र भी संगृहीत हैं।

ब्रज संस्कृति विश्वकोश

भारतीय ज्ञान परम्परा में ब्रज संस्कृति का महत्वपूर्ण योगदान है। अपनी विशिष्टताओं के चलते इसने अखिल भारतीय स्तर पर साहित्य, संगीत एवं कला परम्पराओं के रूप में विशिष्ट पहचान स्थापित की। जिसके ढेरों सन्दर्भ नाना रूपों में देखे जा सकते हंै। ब्रज संस्कृति के इस वृहद स्वरूप को एक स्थान पर लाने के उद्देश्य से संस्थान द्वारा ब्रज संस्कृति विश्वकोश परियोजना पर कार्य किया जा रहा हंै। चार खण्डों में पूर्ण होने वाली इस परियोजना के अंतर्गत प्रथम खण्ड के रूप में ब्रज के इतिहास एवं पुरातत्व पर केन्द्रित प्रथम भाग, दूसरे खण्ड के रूप में ब्रज के धर्म सम्प्रदायों के इतिहास, तृतीय खंड में ब्रज लोक साहित्य का प्रकाशित कर लिया गया है तथा चतुर्थ खंड मे ब्रज की काल परंपरा के प्रकाशन का कार्य चल रहा है।

सर्वेक्षण एवं अभिलेखीकरण

युग-युगीन श्रीकृष्ण-- व्याप्ति एवं संदर्भ

संस्थान की झलक

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