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==पाण्डुलिपि पुस्तकालय==
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==शोध एवं प्रकाशन==
:यह विभाग संस्थान की आत्मा है। यहाँ संस्कृत, हिन्दी, बांग्ला, उड़िया, पंजाबी आदि में लगभग ३०,००० पाण्डुलिपियों का समृद्ध संग्रह है। इसके अतिरिक्त यहाँ २०० लघुचित्र, हस्तनिर्मित चित्र, मूर्तियाँ, सिक्के इत्यादि भी संग्रहीत हैं। बृज क्षेत्र में मन्दिरों के निर्माण हेतु सम्राटों द्वारा दान में दी गई भूमि के फरमान भी पुस्तकालय में उपलब्ध हैं।
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:इस विभाग के अन्तर्गत संस्थान में आने वाले शोध अध्येताओं को शोध सामग्री उपलब्ध कराने के साथ ही यहाँ संरक्षित पाण्डुलिपियों/दस्तावेजों पर केन्द्रित शोध एवं प्रकाशन कार्य किये जाते हैं। विभाग द्वारा अब तक ब्रज संस्कृति से जुड़े विभिन्न विषयों पर 29 शोधपरक विषयों पर पुस्तकों का प्रकाशन कराया जा चुका हैं। जिनमें कई दुर्लभ पाण्डुलिपियों का संपादन भी सम्मिलित हैं। शोध अध्येताओं की संस्थान के हस्तलिखित ग्रन्थागार तक सहजतापूर्वक पहुँच बनाने के लिए विभाग द्वारा संस्कृत, हिन्दी, बंगला और पंजाबी पाण्डुलिपियों के कैटलाॅग भी कई खण्डों में प्रकाशित कराये गये हैं। शोधार्थियों की सुविधार्थ, अधिकाधिक पाण्डुलिपियों तक उनकी पहुँच बनाने के निमित्त संस्थान के द्वारा विभिन्न निजी संग्रहों में रखी पाण्डुलिपियों की डिजिटाइजेशन कराने के साथ ही इनका कैटलाॅग भी प्रकाशित किया गया हैं ताकि अध्येता को संस्थान में एक ही जगह अधिक से अधिक शोध सन्दर्भ प्राप्त हो सकें।
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:विभाग द्वारा वर्तमान में ब्रज संस्कृति के वैविध्यपूर्ण विषयों पर सर्वेक्षण एवं दस्तावेजीकरण की परियोजना भी संचालित हैं। जिसमें ब्रज संस्कृति से जुड़े अलग-अलग पक्षों पर शोध परियोजना तैयार करने के उपरान्त ब्रज के विभिन्न स्थलों पर जाकर सर्वेक्षण करते हुए विभिन्न परंपराओं का दस्तावेजीकरण किया जाता हैं। इसी योजना के अंतर्गत ‘वृन्दावन के रंग मंदिर का श्रीब्रह्मोत्सव’, ‘वृन्दावन की फूल-बंगला कला’, ‘वृन्दावन की मल्लविद्या परम्परा’, ‘ब्रज की तुलसीकंठीमाला’ एवं ‘ब्रज की साँझी’ आदि विषयों पर भी शोधपरक प्रकाशन किये जा चुके हैं। योजनान्तर्गत वर्तमान में ‘ब्रज के पर्वांत्सवों’ पर सर्वेक्षण कार्य जारी है। ब्रज संस्कृति पर केन्द्रित त्रैमासिक शोध पत्रिका ‘ब्रज सलिला’ का प्रकाशन भी विभाग द्वारा निरंतर किया जाता है।
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:गौड़ीय वैष्णव संस्कृति से अभिप्रेत दुर्लभ ग्रंथ रत्नों की विद्यमानता के चलते संस्थान के हस्तलिखित ग्रंथागार का अपना महत्व है। चैतन्य परंपरा के प्रमुख साधक रूप, सनातन एवं जीव गोस्वामी के हस्तलेख हों या बादशाह अकबर का इनके नाम फरमान और इसी के साथ अनेक गौड़ीय साधकों की दुर्लभ पांडुलिपियांऋ सभी कुछ चैतन्य संस्कृति से जुड़े दुर्लभ पक्षों का महत्व दर्शाने वाले हैं। इसी दृष्टिगत वर्तमान में संस्थान चैतन्य महाप्रभु पर एकाग्र वृहद परियोजना तैयार करने में संलग्न है। जिससे संस्थान के हस्तलिखित ग्रंथागार का महत्व अध्येताओं के साथ आमजन के समक्ष उपस्थित तो हो ही, साथ ही चैतन्य संस्कृति से जुड़े नये शोध सन्दर्भ भी अध्येताओं के साथ साझा हो सकें।
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==पाण्डुलिपि पुस्तकालय (हस्तलिखित ग्रंथागार)==
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:संस्थान का समृद्ध हस्तलिखित ग्रंथागार इसकी अपनी विशिष्ट पहिचान है। हिन्दी, बंगला, संस्कृत, गुरुमुखी एवं उड़िया साहित्य की लगभग 35,000 पाण्डुलिपियों की विद्यमानता के चलते यह संस्थान शुरू से ही देशी-विदेशी शोध अध्येताओं के आकर्षण का केन्द्र रहा है। शोध के लिये प्राथमिक सन्दर्भ सामग्री के रूप में यहाँ विद्यमान बादशाह अकबर के फरमान सहित मध्यकालीन विभिन्न रियासतों के द्वारा ब्रज के मन्दिरों को दिये गये विभिन्न दान-पत्र, संकल्प-पत्र, उत्तराधिकार-पत्र एवं प्राचीन याद्दाश्ती अभिलेख इस ग्रंथागार के महत्व का प्रतिपादन करने वाले ह®। यहाँ संरक्षित सूक्ष्माक्षरी एवं दीर्घाक्षरी पाण्डुलिपियों के आकार-प्रकार तथा आयुर्वेद, ज्योतिष, पद-संग्र्रह, उर्दू एवं फारसी आदि विषयवस्तु की विविधताओं के चलते यह ग्रंथागार न केवल शोधार्थियों बल्कि आम पर्यटकों को भी सहज ही अपनी ओर आकर्षित करता है। वैष्णव सम्प्रदायों का हस्तलिखित साहित्य ब्रज संस्कृति की महत्त्वपूर्ण निधि है। ब्रज के विभिन्न मन्दिरों से संस्थान को दानस्वरूप प्राप्त यह ग्रन्थ राशि ब्रज संस्कृति के देवालयी परिवेश से जुड़े साहित्यिक एवं सांस्कृतिक उत्स का भान कराने वाली हैं। संस्थान में विभिन्न भारतीय विश्वविद्यालयों से आने वाले शोध अध्येताओं के साथ ही विदेशी शोध छात्रों द्वारा भी इस साहित्यिक संपदा का उपयोग अपने शोधकार्यों हेतु किया जाता हंै। शोध प्रक्रिया को सहज बनाने के उद्देश्य से संस्थान द्वारा राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन, भारत सरकार के सहयोग से ग्रन्थागार की सभी पाण्डुलिपियों का डिजिटाइजेशन भी कराया गया हैं जिससे शोधार्थियों को तत्काल शोध सहायता मुहैया करायी जा सके। (विस्तृत विवरण हेतु क्लिक करें।)
 
==संदर्भ पुस्तकालय==
 
==संदर्भ पुस्तकालय==
:शोधकर्ताओं एवं छात्रों के लिये अनुसंधान संस्थान में संदर्भ पुस्तकालय भी है जहाँ विभिन्न विषयों पर प्रकाशित पुस्तकें, शब्दकोष, शोध प्रबन्ध एवं लेख, पत्रिकायें इत्यादि उपलब्ध हैं। शोध कार्य हेतु देश-विदेश के शोधकर्ता संदर्भ पुस्तकालय से संपर्क करते हैं।
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:शोधकर्ताओं एवं छात्रों के लिये शोध संस्थान में संदर्भ पुस्तकालय भी है। जहाँ हिन्दी, बंगला, उड़िया, गुजराती, गुरुमुखी, अंग्रेजी, उर्दू एवं फारसी आदि भाषाओं की 15,000 पुस्तकों के साथ ही विभिन्न शब्दकोश पत्रिकायें एवं शोध ग्रन्थ संगृहीत हैं। जिनसे देश-विदेश के अनेक शोधार्थी वर्ष पर्यन्त लाभान्वित होते हैं। (विस्तृत विवरण हेतु क्लिक करें।)
 
==संरक्षण==
 
==संरक्षण==
:अधिकांश पाण्डुलिपियाँ नष्ट, जली हुई अथवा कीड़े लगी हुई प्राप्त हुईं। संस्थान ने उनके संरक्षण उन्हें शोध कार्यों हेतु उपलब्ध कराने के लिये एक प्रयोगशला स्थापित की है। इन पाण्डुलिपियों के संरक्षण हेतु विशेषज्ञ फ्यूमीगेशन, लैमिनेशन, जिल्दबंदी इत्यादि में आधुनिक वैज्ञानिक तरीके अपनाते हैं। इस विभाग द्वारा जनसाधारण एवं पाण्डुलिपि संग्रहकर्ताओं में पाण्डुलिपियों के संरक्षण के प्रति चेतना जागृत करने के उद्देश्य से कार्यशालाओं एवं संगोष्ठियों का आयोजन किया जाता है। विशेषज्ञों को संरक्षण की नवीनतम तकनीकों की जानकारी उपलब्ध कराने के लिये अनेक पाठ्‌यक्रम भी चलाये जाते हैं। सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश के लिये यह संस्थान पाण्डुलिपि संरक्षण केन्द्र के रूप में राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन (एन.एम.एम.) द्वारा अनुमोदित है।
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:वृन्दावन शोध संस्थान के पाण्डुलिपि ग्रन्थालय में संग्रहीत अधिकांश पाण्डुलिपियाँ प्राचीन होने के कारण जीर्ण-शीर्ण एवं कीड़ों व दीमकों आदि के द्वारा खायी हुई अवस्था में प्राप्त होती हैं। इन्हें दीर्घजीवी बनाने इनके स्वरूप को निखारने हेतु संस्थान में आधुनिक तकनीकी युक्त वैज्ञानिक प्रयोगशाला अवस्थित है, जिसमें धूमिकरण, स्याही का स्थायीकरण, अम्लीयकरण, लेमिनेशन और बाइडिंग आदि के द्वारा उन्हें समुचित चिकित्सा करके उन्हें दीर्घजीवी बनाया जाता हंै। पाण्डुलिपि संरक्षण विभाग के द्वारा जन जागृति लाने हेतु यहाँ यथासमय ग्रन्थ संरक्षण के सम्बन्ध में राष्ट्रिय अन्तर्राट्रीय संगोष्ठी, पाठ्यक्रम व कार्यशालायें आदि संचालित की जाती है।
<font style="color:#1F5C99">'''निवारण'''</font><br />
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==माइक्रोफिल्मिंग/डिजिटाइजेशन==
वृन्दावन अनुसंधान संस्थान मूलतः पाण्डुलिपि संग्रहालय एवं संरक्षण केन्द्र है। यहाँ संरक्षण की आधुनिक तकनीक अपनाई जाती है तथा माइक्रोफिल्में भी तैयार की जाती हैं। संस्थान में महत्वपूर्ण पाण्डुलिपियों के संरक्षण हेतु अत्याधुनिक प्रयोगशाला है तथा यहाँ महत्वपूर्ण पाण्डुलिपियों पर शोध उनका प्रकाशन होता है ताकि भारतीय विशेषतः बृज की संस्कृति की रक्षा की जा सके एवं उसके प्रति लोगों के ज्ञानवर्धन के अतिरिक्त रूचि भी जागृत हो। संस्थान के उद्देश्यों के विभिन्न पक्षों पर विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रमों, सेमीनार, गोष्ठियाँ, कार्यशालायें आदि आयोजित की जाती हैं। <br />
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:माइक्रोफिल्मिंग/डिजिटाइजेशन के क्षेत्र में वृन्दावन शोध संस्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। कतिपय अमूल्य ग्रन्थ व पाण्डुलिपि धारक विभिन्न कारणों से अपनी पाण्डुलिपि अथवा ग्रन्थ संस्थान को दान से कतराते हैं। ऐसी स्थिति में संस्थान के द्वारा पाण्डुलिपि व ग्रन्थों की माइक्रोफिल्मिंग कर उन्हें अपने यहाँ सुरक्षित कर लिया जाता है, साथ ही उनको माइक्रो प्रिन्ट्स तत्सम्बन्धित शोधार्थियों को उपलब्ध करा दिये जाते हैं। वर्तमान में संस्थान द्वारा विभिन्न स्थलों पर जाकर डिजिटाइजेशन कार्य पूर्ण किया जा रहा है। विभाग द्वारा निर्दिष्ट स्थलों पर किये गये कार्य के उपरान्त वहाँ विद्यमान पाण्डुलिपियों का कैटलाॅग भी तैयार कर दिया जाता हैं। जिससे शोधार्थियों को अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े।
<font style="color:#1F5C99">'''उपचार'''</font><br />
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वृन्दावन अनुसंधान संस्थान जनसामान्य, पाण्डुलिपि संग्रहकर्ताओं, पुस्तकालय विज्ञान के विद्वानों एवं अन्य लोगों में पाण्डुलिपियों के संरक्षण के व्यावहारिक ज्ञान को प्रोत्साहन देना चाहता है। संस्थान ने विगत वर्ष से पाण्डुलिपि संरक्षण का एक वर्षीय कोर्स प्रारम्भ किया है। यह कोर्स डा० भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा से पाण्डुलिपि विज्ञान एवं पाण्डुलिपि संरक्षण में एक वर्षीय परास्नातक डिप्लोमा हेतु मान्यता प्राप्त है। प्रास्पेक्टस तथा फार्म साईट पर भी उपलब्ध है।
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==फोटोग्राफी==
 
==फोटोग्राफी==
:संस्थान का फोटोग्राफी विभाग महत्वपूर्ण व प्राचीन मन्दिरों, स्मारकों व एतिहासिक महत्व के स्थानों के फोटोग्राफ तैयार करता है तथा बृज की संस्कृति से संबंधित महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कार्यक्रमों का वीडियों तैयार करता है ताकि उन्हें लम्बे समय तक संरक्षित किया जा सके। विभाग द्वारा ब्रज क्षेत्र के एतिहासिक व धार्मिक स्थलों की रंगीन स्लाइडे भी तैयार की जाती हैं।
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:वृन्दावन शोध संस्थान ब्रज के ऐतिहासिक, धार्मिक, पुरातात्विक स्थलों का चित्रांकन करके भी उनका संरक्षण भी कर रहा है। फोटोग्राफी विभाग द्वारा ब्रज की सांस्कृतिक गतिविधियों, आयोजनों रीति-रिवाजों, परम्पराओं आदि की फोटोग्राफी कर उन्हें चित्रांकन रूप में संरक्षित रखा जाता है। इस विभाग के द्वारा दुर्लभ एवं चित्रित पाण्डुलिपियों के डिजिटलाइजेशन का कार्य भी किया जाता है। समय-समय पर विषय केन्द्रित प्रदर्शनियों का आयोजन भी इस विभाग द्वारा किया जाता हंै जिससे ब्रज में आने वाले पर्यटकों के साथ ही युवा पीढ़ी भी ब्रज के सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं ऐतिहासिक पक्षों से साक्षात्कार कर सकें।
 
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==माईक्रोफिल्म==
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:कतिपय मन्दिरों का प्रबंधन तंत्र व विख्यात विद्वान अपना संग्रह दान नहीं करना चाहते हैं। विभाग द्वारा ऐसी दुर्लभ पाण्डुलिपियों की माइक्रोफिल्म तैयार करके शोधकर्ताओं को उपलब्ध कराई जाती है। इस उद्देश्य से संस्थान में आधुनिक माइक्रोफिल्म कैमरा, माइक्रोफिल्म रीडर व प्रिंटर उपलब्ध हैं।
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==प्रशिक्षण==
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==अनुसंधान==
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:वृन्दावन अनुसंधान संस्थान विद्वानों को शोध सुविधाएं उपलब्ध कराता है। इस सस्थान में शोध करने वाले अनेक शोध छात्रों को हिन्दी व संस्कृत में पी.एच.डी. की उपाधि मिल चुकी है। संस्थान द्वारा शोध पर आधारित अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। संस्थान द्वारा अनेक बुलेटिन व समीक्षात्मक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। संस्थान द्वारा संस्कृत पाण्डुलिपियों के छः कैटलॉग, हिन्दी के दो तथा पंजाबी व बांग्ला में माइक्रोफिल्म पाण्डुलिपियों का एक भाग भी प्रकाशित हो चुका है। अन्य प्रकाशनाधीन हैं। संस्थान द्वारा साहित्यिक व संस्कृति त्रैमासिक पत्रिका ब्रजसलिला प्रकाशित की जाती है। संस्थान द्वारा ब्रज की संस्कृति के संवर्धन व संरक्षण हेतु अनेक कार्यक्रम जैसे प्रदर्शनियाँ, सेमीनार, कार्यशालाएं, सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि आयोजित किये जाते हैं।
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==प्रकाशन==
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:वृन्दावन अनुसंधान संस्थान विद्वानों को शोध सुविधायें प्रदान करता है। इस संस्थान से शोध कार्य करने वाले अनेक शोधकर्ताओं की हिन्दी व संस्कृत में पी.एच.डी. उपाधि प्राप्त हो चुकी है। संस्थान ने अनेक शोध पुस्तकें प्रकाशित की हैं। संस्थान द्वारा अनेक बुलेटिन व समीक्षात्मक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। संस्थान के संग्रह में अब तक संस्कृत पाण्डुलिपियों के छः कैटलॉग, हिन्दी के दो तथा पंजाबी व बांग्ला में माइक्रोफिल्म पाण्डुलिपियों का एक-एक भाग भी प्रकाशित हो चुका है। अन्य प्रकाशनाधीन हैं। संस्थान द्वारा साहित्यिक व संस्कृति त्रैमासिक पत्रिका ब्रजसलिला प्रकाशित की जाती है। संस्थान द्वारा ब्रज की संस्कृति के संवर्धन व संरक्षण हेतु अनेक कार्यक्रम जैसे प्रदशर्नियाँ, सेमीनार, कार्यशालाएं, सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि आयोजित किये जाते हैं।
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<font style="color:#1F5C99">'''ब्रज सलिला'''</font><br />
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वृन्दावन अनुसंधान संस्थान भारत, विशेषतः ब्रज के सांस्कृतिक पक्ष को उजागर करने व उसके संवर्धन हेतु एक त्रैमासिक पत्रिका प्रकाशित करता है। इस पत्रिका में संस्थान की गतिविधियों तथा संस्थान व इस क्षेत्र के सांस्कृतिक आयोजनों की विस्तृत रिपोर्ट भी प्रकाशित होती है। ब्रज सलिला की प्रति मंगाने के लिये हमें 'लिखे'।<br />
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<font style="color:#1F5C99">'''डा०एन०सी० बंसल द्वारा संपादित चन्द्रकला'''</font><br />
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यह काव्य छोटा नागपुर (महाराष्ट्र) के प्रेमचन्द्र द्वारा रचित है। ब्रजभाषा की इस रचना में महाकवि तुलसीदास की शैली का अनुसरण किया गया है। यह रचना इस अर्थ में दुर्लभ है कि इसमें सौंदर्य एंव भक्ति दोनों का समावेश है। इसमें लोक एंव उच्च साहित्यिक परम्परा का समागम है। वर्ष १८०७ ई० की इस रचना की विस्तृत भूमिका तथा संलग्नक विद्वानों के लिये लाभदायक हैं।
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डा० (श्रीमती) कमलेश पारीक द्वारा सम्पादित श्रृंगार सरसी रस संस्कृत रचना का विषय नायिका भेद है। इसकी पाण्डुलिपि जयपुर के प्रवंकर संग्रह से प्राप्त हुई है। संपादक ने मूल पाठ का सरल शैली में अनुवाद किया है।
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==ब्रज संस्कृति संग्रहालय==
 
==ब्रज संस्कृति संग्रहालय==
:ब्रज संस्कृति संग्रहालय की स्थापना दुर्लभ एवं प्राचीनी वस्त्रों, वाद्य यंत्रो, लघु चित्रों ताड़ एवं बांस की छाल पर लिखित पाण्डुलिपियों के प्रदर्शन हेतु की गई थी ताकि ब्रज की प्राचीन संस्कृति से लोगों का साक्षात्कार कराया जा सके।
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:ब्रज संस्कृति के साहित्यिक, सांस्कृतिक, सांगीतिक एवं कला-परम्पराओं का परिदर्शन कराता संस्थान का यह अनुभाग अत्यन्त महत्वपूर्ण व ज्ञानवर्धक है। यहाँ पुरातात्विक महत्व की पाण्डुलिपियों के नमूने, पेंटिंग्स, सिक्के, शासकीय फरमान, पट्टे, ब्रज की पारम्परिक पोशाकें, प्राचीन वाद्य यन्त्र व अन्य कलात्मक वस्तुयें प्रदर्शित हैं। इस संग्रहालय में ताड़-पत्र, बाँस-पत्र आदि पर लिखी हुई पाण्डुलिपियाँ एवं विभिन्न शैलियों में बने तैल चित्र भी संगृहीत हैं।
 
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==ब्रज संस्कृति विश्वकोश==
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:भारतीय ज्ञान परम्परा में ब्रज संस्कृति का महत्वपूर्ण योगदान है। अपनी विशिष्टताओं के चलते इसने अखिल भारतीय स्तर पर साहित्य, संगीत एवं कला परम्पराओं के रूप में विशिष्ट पहचान स्थापित की। जिसके ढेरों सन्दर्भ नाना रूपों में देखे जा सकते हंै। ब्रज संस्कृति के इस वृहद स्वरूप को एक स्थान पर लाने के उद्देश्य से संस्थान द्वारा ब्रज संस्कृति विश्वकोश परियोजना पर कार्य किया जा रहा हंै। चार खण्डों में पूर्ण होने वाली इस परियोजना के अंतर्गत प्रथम खण्ड के रूप में ब्रज के इतिहास एवं पुरातत्व पर केन्द्रित प्रथम भाग, दूसरे खण्ड के रूप में ब्रज के धर्म सम्प्रदायों के इतिहास, तृतीय खंड में ब्रज लोक साहित्य का प्रकाशित कर लिया गया है तथा चतुर्थ खंड मे ब्रज की काल परंपरा के प्रकाशन का कार्य चल रहा है।
 
==सर्वेक्षण एवं अभिलेखीकरण==
 
==सर्वेक्षण एवं अभिलेखीकरण==
 
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*'''सर्वेक्षण एवं लोक कलायें (निधि) परम्परा।'''
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==युग-युगीन श्रीकृष्ण-- व्याप्ति एवं संदर्भ==
*अनेक शताब्दियों तक मिश्रित भाषा का प्रसार (दक्षिण केरल)
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*'''सांक्षी (सूची)'''
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*मौखिक, लिखित व चित्रित (सभी प्रकार का) अभिलेखीकरण, पेन्टिंग।
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==संस्थान की झलक==
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[[category:क्रियाकलाप]]
 
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15:25, 5 जनवरी 2020 का अवतरण

शोध एवं प्रकाशन

इस विभाग के अन्तर्गत संस्थान में आने वाले शोध अध्येताओं को शोध सामग्री उपलब्ध कराने के साथ ही यहाँ संरक्षित पाण्डुलिपियों/दस्तावेजों पर केन्द्रित शोध एवं प्रकाशन कार्य किये जाते हैं। विभाग द्वारा अब तक ब्रज संस्कृति से जुड़े विभिन्न विषयों पर 29 शोधपरक विषयों पर पुस्तकों का प्रकाशन कराया जा चुका हैं। जिनमें कई दुर्लभ पाण्डुलिपियों का संपादन भी सम्मिलित हैं। शोध अध्येताओं की संस्थान के हस्तलिखित ग्रन्थागार तक सहजतापूर्वक पहुँच बनाने के लिए विभाग द्वारा संस्कृत, हिन्दी, बंगला और पंजाबी पाण्डुलिपियों के कैटलाॅग भी कई खण्डों में प्रकाशित कराये गये हैं। शोधार्थियों की सुविधार्थ, अधिकाधिक पाण्डुलिपियों तक उनकी पहुँच बनाने के निमित्त संस्थान के द्वारा विभिन्न निजी संग्रहों में रखी पाण्डुलिपियों की डिजिटाइजेशन कराने के साथ ही इनका कैटलाॅग भी प्रकाशित किया गया हैं ताकि अध्येता को संस्थान में एक ही जगह अधिक से अधिक शोध सन्दर्भ प्राप्त हो सकें।
विभाग द्वारा वर्तमान में ब्रज संस्कृति के वैविध्यपूर्ण विषयों पर सर्वेक्षण एवं दस्तावेजीकरण की परियोजना भी संचालित हैं। जिसमें ब्रज संस्कृति से जुड़े अलग-अलग पक्षों पर शोध परियोजना तैयार करने के उपरान्त ब्रज के विभिन्न स्थलों पर जाकर सर्वेक्षण करते हुए विभिन्न परंपराओं का दस्तावेजीकरण किया जाता हैं। इसी योजना के अंतर्गत ‘वृन्दावन के रंग मंदिर का श्रीब्रह्मोत्सव’, ‘वृन्दावन की फूल-बंगला कला’, ‘वृन्दावन की मल्लविद्या परम्परा’, ‘ब्रज की तुलसीकंठीमाला’ एवं ‘ब्रज की साँझी’ आदि विषयों पर भी शोधपरक प्रकाशन किये जा चुके हैं। योजनान्तर्गत वर्तमान में ‘ब्रज के पर्वांत्सवों’ पर सर्वेक्षण कार्य जारी है। ब्रज संस्कृति पर केन्द्रित त्रैमासिक शोध पत्रिका ‘ब्रज सलिला’ का प्रकाशन भी विभाग द्वारा निरंतर किया जाता है।
गौड़ीय वैष्णव संस्कृति से अभिप्रेत दुर्लभ ग्रंथ रत्नों की विद्यमानता के चलते संस्थान के हस्तलिखित ग्रंथागार का अपना महत्व है। चैतन्य परंपरा के प्रमुख साधक रूप, सनातन एवं जीव गोस्वामी के हस्तलेख हों या बादशाह अकबर का इनके नाम फरमान और इसी के साथ अनेक गौड़ीय साधकों की दुर्लभ पांडुलिपियांऋ सभी कुछ चैतन्य संस्कृति से जुड़े दुर्लभ पक्षों का महत्व दर्शाने वाले हैं। इसी दृष्टिगत वर्तमान में संस्थान चैतन्य महाप्रभु पर एकाग्र वृहद परियोजना तैयार करने में संलग्न है। जिससे संस्थान के हस्तलिखित ग्रंथागार का महत्व अध्येताओं के साथ आमजन के समक्ष उपस्थित तो हो ही, साथ ही चैतन्य संस्कृति से जुड़े नये शोध सन्दर्भ भी अध्येताओं के साथ साझा हो सकें।

पाण्डुलिपि पुस्तकालय (हस्तलिखित ग्रंथागार)

संस्थान का समृद्ध हस्तलिखित ग्रंथागार इसकी अपनी विशिष्ट पहिचान है। हिन्दी, बंगला, संस्कृत, गुरुमुखी एवं उड़िया साहित्य की लगभग 35,000 पाण्डुलिपियों की विद्यमानता के चलते यह संस्थान शुरू से ही देशी-विदेशी शोध अध्येताओं के आकर्षण का केन्द्र रहा है। शोध के लिये प्राथमिक सन्दर्भ सामग्री के रूप में यहाँ विद्यमान बादशाह अकबर के फरमान सहित मध्यकालीन विभिन्न रियासतों के द्वारा ब्रज के मन्दिरों को दिये गये विभिन्न दान-पत्र, संकल्प-पत्र, उत्तराधिकार-पत्र एवं प्राचीन याद्दाश्ती अभिलेख इस ग्रंथागार के महत्व का प्रतिपादन करने वाले ह®। यहाँ संरक्षित सूक्ष्माक्षरी एवं दीर्घाक्षरी पाण्डुलिपियों के आकार-प्रकार तथा आयुर्वेद, ज्योतिष, पद-संग्र्रह, उर्दू एवं फारसी आदि विषयवस्तु की विविधताओं के चलते यह ग्रंथागार न केवल शोधार्थियों बल्कि आम पर्यटकों को भी सहज ही अपनी ओर आकर्षित करता है। वैष्णव सम्प्रदायों का हस्तलिखित साहित्य ब्रज संस्कृति की महत्त्वपूर्ण निधि है। ब्रज के विभिन्न मन्दिरों से संस्थान को दानस्वरूप प्राप्त यह ग्रन्थ राशि ब्रज संस्कृति के देवालयी परिवेश से जुड़े साहित्यिक एवं सांस्कृतिक उत्स का भान कराने वाली हैं। संस्थान में विभिन्न भारतीय विश्वविद्यालयों से आने वाले शोध अध्येताओं के साथ ही विदेशी शोध छात्रों द्वारा भी इस साहित्यिक संपदा का उपयोग अपने शोधकार्यों हेतु किया जाता हंै। शोध प्रक्रिया को सहज बनाने के उद्देश्य से संस्थान द्वारा राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन, भारत सरकार के सहयोग से ग्रन्थागार की सभी पाण्डुलिपियों का डिजिटाइजेशन भी कराया गया हैं जिससे शोधार्थियों को तत्काल शोध सहायता मुहैया करायी जा सके। (विस्तृत विवरण हेतु क्लिक करें।)

संदर्भ पुस्तकालय

शोधकर्ताओं एवं छात्रों के लिये शोध संस्थान में संदर्भ पुस्तकालय भी है। जहाँ हिन्दी, बंगला, उड़िया, गुजराती, गुरुमुखी, अंग्रेजी, उर्दू एवं फारसी आदि भाषाओं की 15,000 पुस्तकों के साथ ही विभिन्न शब्दकोश पत्रिकायें एवं शोध ग्रन्थ संगृहीत हैं। जिनसे देश-विदेश के अनेक शोधार्थी वर्ष पर्यन्त लाभान्वित होते हैं। (विस्तृत विवरण हेतु क्लिक करें।)

संरक्षण

वृन्दावन शोध संस्थान के पाण्डुलिपि ग्रन्थालय में संग्रहीत अधिकांश पाण्डुलिपियाँ प्राचीन होने के कारण जीर्ण-शीर्ण एवं कीड़ों व दीमकों आदि के द्वारा खायी हुई अवस्था में प्राप्त होती हैं। इन्हें दीर्घजीवी बनाने व इनके स्वरूप को निखारने हेतु संस्थान में आधुनिक तकनीकी युक्त वैज्ञानिक प्रयोगशाला अवस्थित है, जिसमें धूमिकरण, स्याही का स्थायीकरण, अम्लीयकरण, लेमिनेशन और बाइडिंग आदि के द्वारा उन्हें समुचित चिकित्सा करके उन्हें दीर्घजीवी बनाया जाता हंै। पाण्डुलिपि संरक्षण विभाग के द्वारा जन जागृति लाने हेतु यहाँ यथासमय ग्रन्थ संरक्षण के सम्बन्ध में राष्ट्रिय व अन्तर्राट्रीय संगोष्ठी, पाठ्यक्रम व कार्यशालायें आदि संचालित की जाती है।

माइक्रोफिल्मिंग/डिजिटाइजेशन

माइक्रोफिल्मिंग/डिजिटाइजेशन के क्षेत्र में वृन्दावन शोध संस्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। कतिपय अमूल्य ग्रन्थ व पाण्डुलिपि धारक विभिन्न कारणों से अपनी पाण्डुलिपि अथवा ग्रन्थ संस्थान को दान से कतराते हैं। ऐसी स्थिति में संस्थान के द्वारा पाण्डुलिपि व ग्रन्थों की माइक्रोफिल्मिंग कर उन्हें अपने यहाँ सुरक्षित कर लिया जाता है, साथ ही उनको माइक्रो प्रिन्ट्स तत्सम्बन्धित शोधार्थियों को उपलब्ध करा दिये जाते हैं। वर्तमान में संस्थान द्वारा विभिन्न स्थलों पर जाकर डिजिटाइजेशन कार्य पूर्ण किया जा रहा है। विभाग द्वारा निर्दिष्ट स्थलों पर किये गये कार्य के उपरान्त वहाँ विद्यमान पाण्डुलिपियों का कैटलाॅग भी तैयार कर दिया जाता हैं। जिससे शोधार्थियों को अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े।

फोटोग्राफी

वृन्दावन शोध संस्थान ब्रज के ऐतिहासिक, धार्मिक, पुरातात्विक स्थलों का चित्रांकन करके भी उनका संरक्षण भी कर रहा है। फोटोग्राफी विभाग द्वारा ब्रज की सांस्कृतिक गतिविधियों, आयोजनों रीति-रिवाजों, परम्पराओं आदि की फोटोग्राफी कर उन्हें चित्रांकन रूप में संरक्षित रखा जाता है। इस विभाग के द्वारा दुर्लभ एवं चित्रित पाण्डुलिपियों के डिजिटलाइजेशन का कार्य भी किया जाता है। समय-समय पर विषय केन्द्रित प्रदर्शनियों का आयोजन भी इस विभाग द्वारा किया जाता हंै जिससे ब्रज में आने वाले पर्यटकों के साथ ही युवा पीढ़ी भी ब्रज के सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं ऐतिहासिक पक्षों से साक्षात्कार कर सकें।

ब्रज संस्कृति संग्रहालय

ब्रज संस्कृति के साहित्यिक, सांस्कृतिक, सांगीतिक एवं कला-परम्पराओं का परिदर्शन कराता संस्थान का यह अनुभाग अत्यन्त महत्वपूर्ण व ज्ञानवर्धक है। यहाँ पुरातात्विक महत्व की पाण्डुलिपियों के नमूने, पेंटिंग्स, सिक्के, शासकीय फरमान, पट्टे, ब्रज की पारम्परिक पोशाकें, प्राचीन वाद्य यन्त्र व अन्य कलात्मक वस्तुयें प्रदर्शित हैं। इस संग्रहालय में ताड़-पत्र, बाँस-पत्र आदि पर लिखी हुई पाण्डुलिपियाँ एवं विभिन्न शैलियों में बने तैल चित्र भी संगृहीत हैं।

ब्रज संस्कृति विश्वकोश

भारतीय ज्ञान परम्परा में ब्रज संस्कृति का महत्वपूर्ण योगदान है। अपनी विशिष्टताओं के चलते इसने अखिल भारतीय स्तर पर साहित्य, संगीत एवं कला परम्पराओं के रूप में विशिष्ट पहचान स्थापित की। जिसके ढेरों सन्दर्भ नाना रूपों में देखे जा सकते हंै। ब्रज संस्कृति के इस वृहद स्वरूप को एक स्थान पर लाने के उद्देश्य से संस्थान द्वारा ब्रज संस्कृति विश्वकोश परियोजना पर कार्य किया जा रहा हंै। चार खण्डों में पूर्ण होने वाली इस परियोजना के अंतर्गत प्रथम खण्ड के रूप में ब्रज के इतिहास एवं पुरातत्व पर केन्द्रित प्रथम भाग, दूसरे खण्ड के रूप में ब्रज के धर्म सम्प्रदायों के इतिहास, तृतीय खंड में ब्रज लोक साहित्य का प्रकाशित कर लिया गया है तथा चतुर्थ खंड मे ब्रज की काल परंपरा के प्रकाशन का कार्य चल रहा है।

सर्वेक्षण एवं अभिलेखीकरण

युग-युगीन श्रीकृष्ण-- व्याप्ति एवं संदर्भ

संस्थान की झलक

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