प्रकाशन

वृन्दावन शोध संस्थान विद्वानों के अनुसंधान के लिये सुविधाएँ प्रदान करता है। कई विद्वान इस संस्थान से अनुसंधान कार्य करने के लिए हिंदी और संस्कृत में पीएचडी की डिग्री से सम्मानित किये गये हैं। वी.आर.आई. ने कई शोध पुस्तकें प्रकाशित की हैं। संस्थान ने कई बुलेटिनों और महत्त्वपूर्ण संस्करणों को प्रकाशित किया है। संस्थान द्वारा हमारे पुस्तकालय के लिए संस्कृत पांडुलिपियों को 5 भागों में, हिन्दी पांडुलिपियों को 2 भागों में, पंजाबी, बांग्ला और माइक्रोफ़िल्माकंन की प्रत्येक पांडुलिपि को 1-1 भाग में प्रकाशित किया गया है।
संस्थान साहित्य तथा तिमाही सांस्कृतिक पत्रिका "राज सेला" को भी प्रकाशित करता है। ब्रज की संस्कृति को बचाने तथा संरक्षित करने के लिए वृन्दावन शोध संस्थान विभिन्न कार्यों, जैसे- सांस्कृतिक कार्यक्रमों, सेमिनारों, प्रदर्शनियों तथा कार्यशालाओं का आयोजन आदि करता है।

बृज सलिला

वृन्दावन अनुसंधान संस्थान भारत, विशेषतः बृज के सांस्कृतिक पक्ष को उजागर करने व उसके संवर्धन हेतु एक त्रैमासिक पत्रिका प्रकाशित करता है। इस पत्रिका में संस्थान की गतिविधियों तथा संस्थान व इस क्षेत्र के सांस्कृतिक आयोजनों की विस्तृत रिपोर्ट भी प्रकाशित होती है। बृज सलिला की प्रति मंगाने के लिये हमें 'लिखे'।

डा०एन०सी० बंसल द्वारा संपादित चन्द्रकला

यह काव्य छोटा नागपुर (महाराष्ट्र) के प्रेमचन्द्र द्वारा रचित है। बृजभाषा की इस रचना में महाकवि तुलसीदास की शैली का अनुसरण किया गया है। यह रचना इस अर्थ में दुर्लभ है कि इसमें सौंदर्य एंव भक्ति दोनों का समावेश है। इसमें लोक एंव उच्च साहित्यिक परम्परा का समागम है। वर्ष १८०७ ई० की इस रचना की विस्तृत भूमिका तथा संलग्नक विद्वानों के लिये लाभदायक हैं। डा० (श्रीमती) कमलेश पारीक द्वारा सम्पादित श्रृंगार सरसी रस संस्कृत रचना का विषय नायिका भेद है। इसकी पाण्डुलिपि जयपुर के प्रवंकर संग्रह से प्राप्त हुई है। संपादक ने मूल पाठ का सरल शैली में अनुवाद किया है।