क्रियाकलाप

पाण्डुलिपि पुस्तकालय

यह विभाग संस्थान की आत्मा है। यहाँ संस्कृत, हिन्दी, बांग्ला, उड़िया, पंजाबी आदि में लगभग ३०,००० पाण्डुलिपियों का समृद्ध संग्रह है। इसके अतिरिक्त यहाँ २०० लघुचित्र, हस्तनिर्मित चित्र, मूर्तियाँ, सिक्के इत्यादि भी संग्रहीत हैं। बृज क्षेत्र में मन्दिरों के निर्माण हेतु सम्राटों द्वारा दान में दी गई भूमि के फरमान भी पुस्तकालय में उपलब्ध हैं।

संदर्भ पुस्तकालय

शोधकर्ताओं एवं छात्रों के लिये अनुसंधान संस्थान में संदर्भ पुस्तकालय भी है जहाँ विभिन्न विषयों पर प्रकाशित पुस्तकें, शब्दकोष, शोध प्रबन्ध एवं लेख, पत्रिकायें इत्यादि उपलब्ध हैं। शोध कार्य हेतु देश-विदेश के शोधकर्ता संदर्भ पुस्तकालय से संपर्क करते हैं।

संरक्षण

अधिकांश पाण्डुलिपियाँ नष्ट, जली हुई अथवा कीड़े लगी हुई प्राप्त हुईं। संस्थान ने उनके संरक्षण व उन्हें शोध कार्यों हेतु उपलब्ध कराने के लिये एक प्रयोगशला स्थापित की है। इन पाण्डुलिपियों के संरक्षण हेतु विशेषज्ञ फ्यूमीगेशन, लैमिनेशन, जिल्दबंदी इत्यादि में आधुनिक वैज्ञानिक तरीके अपनाते हैं। इस विभाग द्वारा जनसाधारण एवं पाण्डुलिपि संग्रहकर्ताओं में पाण्डुलिपियों के संरक्षण के प्रति चेतना जागृत करने के उद्देश्य से कार्यशालाओं एवं संगोष्ठियों का आयोजन किया जाता है। विशेषज्ञों को संरक्षण की नवीनतम तकनीकों की जानकारी उपलब्ध कराने के लिये अनेक पाठ्‌यक्रम भी चलाये जाते हैं। सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश के लिये यह संस्थान पाण्डुलिपि संरक्षण केन्द्र के रूप में राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन (एन.एम.एम.) द्वारा अनुमोदित है।

निवारण
वृन्दावन अनुसंधान संस्थान मूलतः पाण्डुलिपि संग्रहालय एवं संरक्षण केन्द्र है। यहाँ संरक्षण की आधुनिक तकनीक अपनाई जाती है तथा माइक्रोफिल्में भी तैयार की जाती हैं। संस्थान में महत्वपूर्ण पाण्डुलिपियों के संरक्षण हेतु अत्याधुनिक प्रयोगशाला है तथा यहाँ महत्वपूर्ण पाण्डुलिपियों पर शोध व उनका प्रकाशन होता है ताकि भारतीय विशेषतः बृज की संस्कृति की रक्षा की जा सके एवं उसके प्रति लोगों के ज्ञानवर्धन के अतिरिक्त रूचि भी जागृत हो। संस्थान के उद्देश्यों के विभिन्न पक्षों पर विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रमों, सेमीनार, गोष्ठियाँ, कार्यशालायें आदि आयोजित की जाती हैं।
उपचार
वृन्दावन अनुसंधान संस्थान जनसामान्य, पाण्डुलिपि संग्रहकर्ताओं, पुस्तकालय विज्ञान के विद्वानों एवं अन्य लोगों में पाण्डुलिपियों के संरक्षण के व्यावहारिक ज्ञान को प्रोत्साहन देना चाहता है। संस्थान ने विगत वर्ष से पाण्डुलिपि संरक्षण का एक वर्षीय कोर्स प्रारम्भ किया है। यह कोर्स डा० भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा से पाण्डुलिपि विज्ञान एवं पाण्डुलिपि संरक्षण में एक वर्षीय परास्नातक डिप्लोमा हेतु मान्यता प्राप्त है। प्रास्पेक्टस तथा फार्म साईट पर भी उपलब्ध है।

फोटोग्राफी

संस्थान का फोटोग्राफी विभाग महत्वपूर्ण व प्राचीन मन्दिरों, स्मारकों व एतिहासिक महत्व के स्थानों के फोटोग्राफ तैयार करता है तथा बृज की संस्कृति से संबंधित महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कार्यक्रमों का वीडियों तैयार करता है ताकि उन्हें लम्बे समय तक संरक्षित किया जा सके। विभाग द्वारा ब्रज क्षेत्र के एतिहासिक व धार्मिक स्थलों की रंगीन स्लाइडे भी तैयार की जाती हैं।

माईक्रोफिल्म

कतिपय मन्दिरों का प्रबंधन तंत्र व विख्यात विद्वान अपना संग्रह दान नहीं करना चाहते हैं। विभाग द्वारा ऐसी दुर्लभ पाण्डुलिपियों की माइक्रोफिल्म तैयार करके शोधकर्ताओं को उपलब्ध कराई जाती है। इस उद्देश्य से संस्थान में आधुनिक माइक्रोफिल्म कैमरा, माइक्रोफिल्म रीडर व प्रिंटर उपलब्ध हैं।

प्रशिक्षण

अनुसंधान

वृन्दावन अनुसंधान संस्थान विद्वानों को शोध सुविधाएं उपलब्ध कराता है। इस सस्थान में शोध करने वाले अनेक शोध छात्रों को हिन्दी व संस्कृत में पी.एच.डी. की उपाधि मिल चुकी है। संस्थान द्वारा शोध पर आधारित अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। संस्थान द्वारा अनेक बुलेटिन व समीक्षात्मक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। संस्थान द्वारा संस्कृत पाण्डुलिपियों के छः कैटलॉग, हिन्दी के दो तथा पंजाबी व बांग्ला में माइक्रोफिल्म पाण्डुलिपियों का एक भाग भी प्रकाशित हो चुका है। अन्य प्रकाशनाधीन हैं। संस्थान द्वारा साहित्यिक व संस्कृति त्रैमासिक पत्रिका ब्रजसलिला प्रकाशित की जाती है। संस्थान द्वारा ब्रज की संस्कृति के संवर्धन व संरक्षण हेतु अनेक कार्यक्रम जैसे प्रदर्शनियाँ, सेमीनार, कार्यशालाएं, सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि आयोजित किये जाते हैं।

प्रकाशन

वृन्दावन अनुसंधान संस्थान विद्वानों को शोध सुविधायें प्रदान करता है। इस संस्थान से शोध कार्य करने वाले अनेक शोधकर्ताओं की हिन्दी व संस्कृत में पी.एच.डी. उपाधि प्राप्त हो चुकी है। संस्थान ने अनेक शोध पुस्तकें प्रकाशित की हैं। संस्थान द्वारा अनेक बुलेटिन व समीक्षात्मक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। संस्थान के संग्रह में अब तक संस्कृत पाण्डुलिपियों के छः कैटलॉग, हिन्दी के दो तथा पंजाबी व बांग्ला में माइक्रोफिल्म पाण्डुलिपियों का एक-एक भाग भी प्रकाशित हो चुका है। अन्य प्रकाशनाधीन हैं। संस्थान द्वारा साहित्यिक व संस्कृति त्रैमासिक पत्रिका ब्रजसलिला प्रकाशित की जाती है। संस्थान द्वारा ब्रज की संस्कृति के संवर्धन व संरक्षण हेतु अनेक कार्यक्रम जैसे प्रदशर्नियाँ, सेमीनार, कार्यशालाएं, सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि आयोजित किये जाते हैं।

ब्रज सलिला
वृन्दावन अनुसंधान संस्थान भारत, विशेषतः ब्रज के सांस्कृतिक पक्ष को उजागर करने व उसके संवर्धन हेतु एक त्रैमासिक पत्रिका प्रकाशित करता है। इस पत्रिका में संस्थान की गतिविधियों तथा संस्थान व इस क्षेत्र के सांस्कृतिक आयोजनों की विस्तृत रिपोर्ट भी प्रकाशित होती है। ब्रज सलिला की प्रति मंगाने के लिये हमें 'लिखे'।
डा०एन०सी० बंसल द्वारा संपादित चन्द्रकला
यह काव्य छोटा नागपुर (महाराष्ट्र) के प्रेमचन्द्र द्वारा रचित है। ब्रजभाषा की इस रचना में महाकवि तुलसीदास की शैली का अनुसरण किया गया है। यह रचना इस अर्थ में दुर्लभ है कि इसमें सौंदर्य एंव भक्ति दोनों का समावेश है। इसमें लोक एंव उच्च साहित्यिक परम्परा का समागम है। वर्ष १८०७ ई० की इस रचना की विस्तृत भूमिका तथा संलग्नक विद्वानों के लिये लाभदायक हैं। डा० (श्रीमती) कमलेश पारीक द्वारा सम्पादित श्रृंगार सरसी रस संस्कृत रचना का विषय नायिका भेद है। इसकी पाण्डुलिपि जयपुर के प्रवंकर संग्रह से प्राप्त हुई है। संपादक ने मूल पाठ का सरल शैली में अनुवाद किया है।

ब्रज संस्कृति संग्रहालय

ब्रज संस्कृति संग्रहालय की स्थापना दुर्लभ एवं प्राचीनी वस्त्रों, वाद्य यंत्रो, लघु चित्रों ताड़ एवं बांस की छाल पर लिखित पाण्डुलिपियों के प्रदर्शन हेतु की गई थी ताकि ब्रज की प्राचीन संस्कृति से लोगों का साक्षात्कार कराया जा सके।

सर्वेक्षण एवं अभिलेखीकरण

  • सर्वेक्षण एवं लोक कलायें (निधि) परम्परा।
  • अनेक शताब्दियों तक मिश्रित भाषा का प्रसार (दक्षिण केरल)
  • सांक्षी (सूची)
  • मौखिक, लिखित व चित्रित (सभी प्रकार का) अभिलेखीकरण, पेन्टिंग।